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Overviewदुख, शोक, आतंक और अत्याचार की रंगभूमि पीछे छूट गई। जीवन की कारा पीछे रह गई। उदयादित्य ने मन-ही-मन संकल्प लिया, 'इस घर में अब जीते जी लौटकर आना नहीं है।' एक बार उन्होंने मुड़कर पीछे देखा। रक्तपिपासु और पाषाण हृदय राजमहल आकाश में सिर उठाए दैत्य की तरह खड़ा दिखा। षड्यंन, स्वेच्छाचारिता, रक्तलालसा, दुर्बलों का उत्पीड़न, असहायों के आँसु, सबकुछ वहीं पड़ा रह गया। सामने अनंत स्वाधीनता, प्रकृति का निष्कलंक सौंदर्य और हृदय के स्वाभाविक नेह-प्रेम ने उन्हें आलिंगनबद्ध करने के लिए अपने हाथ बढ़ा दिए। उस समय सवेरा हो रहा था। नदी के पूरब में उस पार जंगल की सीमा के बीच से सूर्य की किरण-राशि अपनी छटा ऊपर आकाश की ओर बिखेर रही थी। पेड़-पौधों की फुनगियाँ स्वर्णिम आभा से खिल उठीं। लोग जग रहे थे। मल्लाह बड़े आनंद से गान गाते हुए पाल चढ़ाकर नाव खे रहे थे। इस शुभ्र शांत और निर्मल प्रकृति की प्रभात-वेला में उसका प्रशांत चेहरा देखकर उदद्यादित्य का मन-प्राण पंछियों की तरह अपने पंख पसारकर उन्मुक्त गान गाने लगा। उन्होंने मन-ही-मन यह कामना की, 'मैं जन्म-जन्मांतर तक प्रकृति के इसी विमल-श्यामल विस्तार के बीच उन्मुक्त भाव से विचरण करता रहूँ और सरल एवं निश्छल प्राणियों के साथ मिल-जुलकर रह सकूँ।' Full Product DetailsAuthor: Rabindranath TagorePublisher: Prabhakar Prakashan Private Limited Imprint: Prabhakar Prakashan Private Limited ISBN: 9789367931080ISBN 10: 9367931085 Pages: 170 Publication Date: 23 June 2025 Audience: General/trade , General Format: Hardback Publisher's Status: Active Availability: Available To Order We have confirmation that this item is in stock with the supplier. It will be ordered in for you and dispatched immediately. Language: Hindi Table of ContentsReviewsAuthor InformationTab Content 6Author Website:Countries AvailableAll regions |
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